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दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान ने दीप नगर कैंट में करवाया सत्संग

दिव्य ज्योति जाग्रति संस्थान की और से दीप नगर कैंट में एक सत्संग करवाया गया जिसमें सर्व श्री आशुतोष महाराज जी की शिष्या साध्वी वत्सला भारती जी ने अपने प्रवचनों में कहा कि चि8ा की शुद्धि यानी वृ8िायों का निरोध कैसे करें इसके बारे में बताते हुए कहा कि चि8ा व मन को शुद्ध करने के लिए इसको नियंत्रित करना आवश्यक है । मन एवं प्राण में से एक के निरूद्ध होने पर दूसरे की गति भी निरूद्ध हो जाती है । इससे उल्ट एक के गतिशील होने से दूसरा भी गतिशील हो जाता है । इसलिए मन को स्थिर करने को सूत्र प्राणोंको नियंत्रित करना बताया गया है । बहिर्मुखी मन से अंतर्मुखी होने का अत्यंत दुष्कर कार्य है । अर्थात ईश्वर में अपने चि8ा को स्थिर करने में असमर्थ होने पर अ•याास योग द्वारा ईश्वर को प्राप्त करने की चेष्टा करनी चाहिए ।अ•यास योग से अभिप्राय है समस्त वे कार्य जिनमें संसार की ओर जाती इंद्रियाँ व मन – बुद्धि तंत्र इंश्वर की और उनमुख हो जाए । इसी को योग की संज्ञा दी गयी है । येग से भाव है जुडना अर्थात जब केवल ध्येय स्वरूप का ही भान रह जाए और स्व स्वरूप के भान का अभाव हो जाए । योग की वे अवस्था जिसमें चि8ा वृतियों का पूरी तरह निरोध हो जाए ,वह समाधि है । इस समाधि रूपी योगी की अवस्था के बारे में कठोपनिषद में लिखा है । लेकिन ये अवस्थ गुरू द्वारा ही प्राप्त होता है उस सर्वोत्म अवस्था से ही मोक्ष प्राप्त होता है ।

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